शनिवार प्रदोष व्रत कथा,महत्व विधि,पूजन।
शनिवार प्रदोष व्रत कथा ,महत्व, पूजा विधि
शनिवार प्रदोष व्रत का विशेष महत्व होता है,इस व्रत में भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती की पूजा आराधना की जाती है। शनिवार प्रदोष व्रत से पुत्र, सुख, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
इस व्रत में प्रदोष काल में भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती की पूजा की जाती है। इस व्रत से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। पुत्र की प्राप्ति होती है और दांपत्य जीवन में भी सुख समृद्धि आती है।
शनिवार प्रदोष व्रत कथा ;
शनिवार के दिन पढ़ने वाली प्रदोष या त्रयोदशी तिथि को ही शनि प्रदोष व्रत माना जाता है। इस दिन भगवान शिव का और भगवान शनि देव की पूजा की जा सकती है खासकर प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा की जाती है और ऐसे त्रयोदशी शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है।
इसकी कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक नगर सेठ थे। सेठजी के घर में हर प्रकार की सुख-सुविधाएं थीं लेकिन संतान नहीं होने के कारण सेठ और सेठानी हमेशा दुःखी रहते थे। काफी सोच-विचार करके सेठजी ने अपना काम नौकरों को सौंप दिया और खुद सेठानी के साथ तीर्थयात्रा पर निकल पड़े।
अपने नगर से बाहर निकलने पर उन्हें एक साधु मिले, जो ध्यानमग्न बैठे थे। सेठजी ने सोचा, क्यों न साधु से आशीर्वाद लेकर आगे की यात्रा की जाए। सेठ और सेठानी साधु के निकट बैठ गए। साधु ने जब आंखें खोलीं तो उन्हें ज्ञात हुआ कि सेठ और सेठानी काफी समय से आशीर्वाद की प्रतीक्षा में बैठे हैं।
साधु ने सेठ और सेठानी से कहा कि मैं तुम्हारा दुःख जानता हूं। तुम शनि प्रदोष व्रत करो, इससे तुम्हें संतान सुख प्राप्त होगा। साधु ने सेठ-सेठानी प्रदोष व्रत की विधि भी बताई और शंकर भगवान की निम्न वंदना बताई।
हे रुद्रदेव शिव नमस्कार।
शिवशंकर जगगुरु नमस्कार।।
हे नीलकंठ सुर नमस्कार।
शशि मौलि चन्द्र सुख नमस्कार।।
हे उमाकांत सुधि नमस्कार।
उग्रत्व रूप मन नमस्कार।।
ईशान ईश प्रभु नमस्कार।
विश्वेश्वर प्रभु शिव नमस्कार।।
दोनों साधु से आशीर्वाद लेकर तीर्थयात्रा के लिए आगे चल पड़े। तीर्थयात्रा से लौटने के बाद सेठ और सेठानी ने मिलकर शनि प्रदोष व्रत किया जिसके प्रभाव से उनके घर एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ।

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